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वृत्रगीता • अध्याय 2 • श्लोक 55
भीष्म उवाच- एवमुक्त्वा स कौन्तेय वृत्रः प्राणानवासृजत् । योजयित्वा तथात्मानं परं स्थानमवाप्तवान् ॥
भीष्मजी कहते हैं - कुन्तीनन्दन! ऐसा कहकर वृत्रासुर ने अपने आत्मा को परमात्मा में लगाकर उन्हीं का ध्यान करते हुए प्राण त्याग दिये और परमेश्वर के परमधाम को प्राप्त कर लिया।
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