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वृत्रगीता • अध्याय 2 • श्लोक 17
कर्मणा स्वनुरक्तानि विरक्तानि च दानव । यथा कर्मविशेषांश्च प्राप्नुवन्ति तथा शृणु ॥
दनुनन्दन! कर्म से अनुरक्त और कर्म से विरक्त होने वाले प्राणिसमूह जिस प्रकार राग और विराग के हेतुभूत विभिन्न कर्मों को प्राप्त होते हैं, वह सुनो!
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