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वृत्रगीता • अध्याय 2 • श्लोक 48
प्रजाविसर्गं तु सशेषकाले स्थानानि स्वान्येव सरन्ति जीवाः । निःशेषतस्तत्पदं यान्ति चान्ते सर्वे देवा ये सदृशा मनुष्याः ॥
प्रलयकाल में जो जीव देवभाव को प्राप्त थे, वे यदि अपने सम्पूर्ण कर्मफलों का उपभोग समाप्त करने से पहले ही लय को प्राप्त हो जाते हैं तो कल्पान्तर में पुनः प्रजा की सृष्टि होने पर वे शेष फल का उपभोग करने के लिये उन्हीं स्थानों को प्राप्त होते हैं, जो उन्हें पूर्वकल्प में प्राप्त थे; किंतु जो कल्पान्त में उस योनिसम्बन्धी कर्मफल-भोग को पूर्ण कर चुके हैं, वे स्वर्गलोक का नाश हो जाने पर दूसरे कल्प में उनके जैसे कर्म हैं, उसी के सदृश अन्य प्राणियों की भाँति मनुष्य-योनि को ही प्राप्त होते हैं।
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