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वृत्रगीता • अध्याय 2 • श्लोक 29
संहारविक्षेपसहस्त्रकोटी-स्तिष्ठन्ति जीवाः प्रचरन्ति चान्ये । प्रजाविसर्गस्य च वापीसहस्त्राणि पारिमाण्यं बहूनि दैत्य ॥
हे दैत्य! संहार और सृष्टि-विस्तार के असंख्य सहस्रों-करोड़ों चक्रों में अनगिनत जीव स्थित रहते हैं, और अनेक अन्य जीव निरन्तर गमनागमन करते रहते हैं। इसी प्रकार प्रजाओं की सृष्टि और उनके विस्तार के भी असंख्य सहस्रों प्रकार और अपरिमित परिमाण हैं।
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