मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
वृत्रगीता • अध्याय 2 • श्लोक 34
शतं सहस्त्राणि चतुर्दशेह परागतिर्जीवगणस्य दैत्य । आरोहणं विद्धि तत्कृतमेव स्थानं तथा निःसरणं च तेषाम् ॥
हे दैत्य! जीवसमूह की परम गति (उच्चतम आध्यात्मिक अवस्था) को प्राप्त होने में यहाँ एक लाख चौदह हजार अवस्थाओं अथवा क्रमों का उल्लेख किया गया है। उनके उत्थान (आरोहण), विभिन्न स्थितियों में निवास, तथा वहाँ से निर्गमन — इन सबको उनके अपने कर्मों का ही परिणाम समझो।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
वृत्रगीता के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

वृत्रगीता के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें