शतं सहस्त्राणि चतुर्दशेह परागतिर्जीवगणस्य दैत्य ।
आरोहणं विद्धि तत्कृतमेव स्थानं तथा निःसरणं च तेषाम् ॥
दैत्यप्रवर! इस जगत्में समस्त जीव-समुदाय की परागति चौदह लाख बतायी गयी है। (पाँच कर्मेन्द्रिय, पाँच ज्ञानेन्द्रिय तथा मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार - ये चौदह करण हैं। इन्हीं के भेद से चौदह प्रकार की गति होती है। फिर विषयभेद से वृत्तिभेद होने के कारण चौदह लाख प्रकार की गति होती है।) जीव का जो ऊर्ध्व लोकों में गमन होता है, वह भी उन्हीं चौदह करणों द्वारा सम्पादित होता है। विभिन्न स्थानों में जो स्थिरतापूर्वक निवास है, वह और उन स्थानों से जो उन जीवों का अधःपतन होता है, वह भी उन्हीं के सम्बन्ध से होता है। इस बात को तुम अच्छी तरह जान लो (अतः इन चौदह करणों को सात्त्विक मार्गाभिमुखी बनाना चाहिये)।
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