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वृत्रगीता • अध्याय 2 • श्लोक 14
यथा चाल्पेन माल्येन वासितं तिलसर्षपम् । न मुञ्चति स्वकं गन्धं तद्वत् सूक्ष्मस्य दर्शनम् ॥
जिस प्रकार थोड़े-से पुष्पों के सम्पर्क में आने पर तिल और सरसों सुगन्धित तो हो जाते हैं, किन्तु वे अपने स्वाभाविक गन्ध को पूर्णतः नहीं छोड़ते, उसी प्रकार सूक्ष्म तत्त्व (आत्मस्वरूप) का साक्षात्कार भी क्रमशः और गहन साधना के द्वारा ही होता है।
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