अर्वाक् स्थितस्तु यः स्थायी कल्पान्ते परिवर्तते।
स शेते भगवानप्सु योऽसावतिबलः प्रभुः ।
तान् विधाता प्रसन्नात्मा लोकांश्चरति शाश्वतान् ॥
जो प्रकट जगत् में स्थित होकर सृष्टि की स्थिरता का आधार बनता है और कल्पान्त में परिवर्तित हो जाता है,
वही अत्यन्त पराक्रमीभगवान् प्रभु प्रलयकाल में जल में शयन करते हैं।
और वही प्रसन्नचित्त विधाता उन शाश्वत लोकों की रचना, धारण और व्यवस्था करते हैं।
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