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वृत्रगीता • अध्याय 2 • श्लोक 59
अर्वाक् स्थितस्तु यः स्थायी कल्पान्ते परिवर्तते। स शेते भगवानप्सु योऽसावतिबलः प्रभुः । तान् विधाता प्रसन्नात्मा लोकांश्चरति शाश्वतान् ॥
जो परवर्ती सनातन नारायण प्रलयकाल में भी विद्यमान हैं, वे ही अत्यन्त बलशाली और सबके अधीश्वर भगवान् श्रीहरि कल्पान्त में जल के भीतर शयन करते हैं तथा वे प्रसन्नात्मा सृष्टिकर्ता ईश्वर उन समस्त शाश्वत लोकों में विचरण करते हैं।
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