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वृत्रगीता • अध्याय 2 • श्लोक 21
पादौ तस्य महीं विद्धि मूर्धानं दिवमित्युत । बाहवस्तु दिशो दैत्य श्रोत्रमाकाशमेव तस्य च ॥ तेजोमयः सूर्यो मनश्चन्द्रमसि स्थितम् । बुद्धिर्ज्ञानगता नित्यं रसस्त्वप्सु प्रतिष्ठितः ॥
दैत्यराज! पृथ्वी को भगवान् विष्णु के दोनों चरण समझो, स्वर्ग-लोक को मस्तक जानो, ये चारों दिशाएँ उनकी चार भुजाएँ हैं, आकाश कान है, तेजस्वी सूर्य उनका नेत्र है, मन चन्द्रमा है, बुद्धि (महत्तत्त्व) उनकी नित्य ज्ञानवृत्ति है और जल रसनेन्द्रिय है।
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