हे दैत्य! इस विराट् पुरुष के चरणों को पृथ्वी और उनके मस्तक को स्वर्ग जानो।
उनकी भुजाएँ ही दिशाएँ हैं, और उनका श्रवण(कर्ण)आकाश है।
तेजोमय सूर्य उनका प्रकाशस्वरूप है, और चन्द्रमा में उनका मन स्थित है।
उनकी बुद्धि नित्य ज्ञान में प्रतिष्ठित है, और उनका रसस्वरूपजल में स्थित है।
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