वाप्यः पुनर्योजनविस्तृतास्ताः क्रोशं च गम्भीरतयावगाढाः । आयामतः पञ्चशताश्च सर्वाः प्रत्येकशो योजनतः प्रवृद्धाः ॥
वाप्या जलं क्षिप्यति बालकोट्या त्वह्ना सकृच्चाप्यथ न द्वितीयम् । तासां क्षये विद्धि परं विसर्गं संहारमेकं च तथा प्रजानाम् ॥
हे दैत्य! कल्पना करो कि अत्यन्त विशाल सरोवर हैं, जो अनेक योजन तक विस्तृत हैं, एक क्रोश(कोस) तक गहरे हैं, और लम्बाई में प्रत्येक पाँच सौ योजन तक फैले हुए हैं।
यदि कोई बालक प्रतिदिन उनमें से केवल एक बार थोड़ा-सा जल निकालता रहे और दूसरी बार ऐसा न करे,
तो उन विशाल सरोवरों के पूर्णतः शून्य हो जाने में जितना समय लगे, उसी को प्रजाओं की एक महान् सृष्टि और एक संहार-चक्र की अवधि के समान समझो।
(अर्थात् जैसे उक्त प्रकार से उलीचने पर उन बावड़ियों का जल सूखना असम्भव है, वैसे ही बिना ज्ञान के संसार का उच्छेद होना असम्भव है।)
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