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वृत्रगीता • अध्याय 2 • श्लोक 15
तदेव बहुभिर्माल्यैर्वास्यमानं पुनः पुनः । विमुञ्चति स्वकं गन्धं माल्यगन्धे च तिष्ठति ॥
वही तिल या सरसों का तेल बहुत-से सुगन्धित पुष्पों द्वारा बारम्बार वासित होने पर अपनी गन्ध को छोड़ देता है और उस फूल की गन्ध में ही स्थित हो जाता है।
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