तदेव बहुभिर्माल्यैर्वास्यमानं पुनः पुनः ।
विमुञ्चति स्वकं गन्धं माल्यगन्धे च तिष्ठति ॥
किन्तु वही तिल और सरसों, जब बार-बार बहुत से पुष्पों के सम्पर्क में सुगन्धित किए जाते हैं, तब वे अपने स्वाभाविक गन्ध को छोड़कर पुष्पों की सुगन्ध में ही स्थित हो जाते हैं।
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