समस्त प्राणी इन्हीं में लय को प्राप्त होते हैं और इन्हीं से प्रकट भी होते हैं। इन्हें कोई शास्त्रज्ञान, तपस्या और यज्ञ के द्वारा भी नहीं पा सकता। केवल इन्द्रियों के संयम से ही उनकी उपलब्धि हो सकती है।
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