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वृत्रगीता • अध्याय 2 • श्लोक 9
अस्मिन् गच्छन्ति विलयमस्माच्च प्रभवन्त्युत । नैष ज्ञानवता शक्यस्तपसा नैव चेज्यया। सम्प्राप्तुमिन्द्रियाणां तु संयमेनैव शक्यते ॥
समस्त प्राणी इन्हीं में लय को प्राप्त होते हैं और इन्हीं से प्रकट भी होते हैं। इन्हें कोई शास्त्रज्ञान, तपस्या और यज्ञ के द्वारा भी नहीं पा सकता। केवल इन्द्रियों के संयम से ही उनकी उपलब्धि हो सकती है।
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