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वृत्रगीता • अध्याय 2 • श्लोक 11
यथा हिरण्यकर्ता वै रूप्यमग्नौ विशोधयेत् । बहुशोऽतिप्रयत्नेन महतात्मकृतेन ह ॥
जिस प्रकार स्वर्णकार अत्यन्त परिश्रम और सावधानी के साथ अग्नि में रजत (या धातु) को बार-बार तपाकर उसे शुद्ध करता है, उसी प्रकार महान् प्रयत्न द्वारा साधक अपने अन्तःकरण को भी शुद्ध करता है।
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