जिस प्रकार स्वर्णकार अत्यन्त परिश्रम और सावधानी के साथ अग्नि में रजत(या धातु) को बार-बार तपाकर उसे शुद्ध करता है,
उसी प्रकार महान् प्रयत्न द्वारा साधक अपने अन्तःकरण को भी शुद्ध करता है।
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