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वृत्रगीता • अध्याय 2 • श्लोक 46
सप्तैव संहारमुपप्लवानि सम्भाव्य संतिष्ठति जीवलोके । ततोऽव्ययं स्थानमनन्तमेति देवस्य विष्णोरथ ब्रह्मणश्च। शेषस्य चैवाथ नरस्य चैव देवस्य विष्णोः परमस्य चैव ॥
इसके पश्चात् वह जीव सात महाप्रलयों और उपप्लवों (विशाल संहार-चक्रों) का अनुभव करके जीवलोक में स्थित रहता है। तत्पश्चात् वह अविनाशी और अनन्त पद को प्राप्त करता है, जो भगवान् विष्णु, ब्रह्मा, शेष, तथा नर के दिव्य स्वरूपों से सम्बन्धित परम अवस्था कही गई है। अन्ततः वह परम भगवान् विष्णु के उस अक्षय और सर्वोच्च धाम को प्राप्त होता है।
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