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वृत्रगीता • अध्याय 2 • श्लोक 12
तद्वज्जातिशतैर्जीवः शुद्धयतेऽनेन कर्मणा। यत्नेन महता चैवाप्येकजातौ विशुद्धयते ॥
उसी प्रकार जीव भी इस कर्म (आत्मशुद्धि के साधनरूप आचरण) के द्वारा सैकड़ों जन्मों में क्रमशः शुद्ध होता है। किन्तु अत्यन्त महान् प्रयत्न और साधना के द्वारा वह एक ही जन्म में भी पूर्ण विशुद्धि को प्राप्त कर सकता है।
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