अकर्मणः फलं चैव स एव परमव्ययः ।
छन्दांसि यस्य रोमाणि ह्यक्षरं च सरस्वती ॥
कर्मों का त्यागरूप जो संन्यास है, उसका फल भी वे ही अविनाशी परमात्मा हैं। वेद-मन्त्र उनके रोम हैं तथा प्रणव उनकी वाणी है।
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