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वृत्रगीता • अध्याय 2 • श्लोक 24
अकर्मणः फलं चैव स एव परमव्ययः । छन्दांसि यस्य रोमाणि ह्यक्षरं च सरस्वती ॥
अकर्म (निष्काम एवं कर्मातीत अवस्था) का फल भी वही परम अविनाशी (अव्यय) भगवान् हैं। जिनके रोम ही वेद (छन्द) हैं, और जिनकी अक्षरस्वरूप वाणी ही सरस्वती है।
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