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वृत्रगीता • अध्याय 2 • श्लोक 36
शतं सहस्त्राणि ततश्चरित्वा प्राप्नोति वर्णं हरितं तु पश्चात् । स चैव तस्मिन् निवसत्यनीशो युगक्षये तपसा संवृतात्मा ॥
इसके पश्चात्, असंख्य जन्मों और अनुभवों का क्रम पूरा करके, जीव हरित वर्ण (उच्चतर आध्यात्मिक अवस्था) को प्राप्त करता है। और उस अवस्था में भी वह अभी पूर्णतः स्वतन्त्र नहीं होता; बल्कि युगों के अंत तक तप और संयम के द्वारा अपने अन्तःकरण को नियंत्रित करता हुआ स्थित रहता है।
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