तदनन्तर वह जीव लाखों बार (या लाखों वर्षों तक) नरक में विचरण करके फिर धूम्रवर्ण पाता है (पशु-पक्षी आदि की योनि में जन्म लेता है)। उस योनि में भी वह विवश होकर बड़े दुःख से निवास करता है। फिर युगक्षय होने पर वह तप (पुरातन पुण्यकर्म या विवेक) के प्रभाव से सुरक्षित होकर उस संकट से उद्धार पा जाता है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
वृत्रगीता के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
वृत्रगीता के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।