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वृत्रगीता • अध्याय 2 • श्लोक 36
शतं सहस्त्राणि ततश्चरित्वा प्राप्नोति वर्णं हरितं तु पश्चात् । स चैव तस्मिन् निवसत्यनीशो युगक्षये तपसा संवृतात्मा ॥
तदनन्तर वह जीव लाखों बार (या लाखों वर्षों तक) नरक में विचरण करके फिर धूम्रवर्ण पाता है (पशु-पक्षी आदि की योनि में जन्म लेता है)। उस योनि में भी वह विवश होकर बड़े दुःख से निवास करता है। फिर युगक्षय होने पर वह तप (पुरातन पुण्यकर्म या विवेक) के प्रभाव से सुरक्षित होकर उस संकट से उद्धार पा जाता है।
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