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वृत्रगीता • अध्याय 2 • श्लोक 26
श्रुतिशास्त्रग्रहोपेतः षोडशत्विक् क्रतुश्च सः । पितामहश्च विष्णुश्च सोऽश्विनौ स पुरन्दरः । मित्रोऽथ वरुणश्चैव यमोऽथ धनदस्तथा ॥
वही भगवान् श्रुति, शास्त्र और ग्रहों से युक्त, षोडश ऋत्विजों (सोलह यज्ञपुरोहितों) सहित यज्ञस्वरूप हैं। वही पितामह (ब्रह्मा) हैं, वही विष्णु हैं, वही अश्विनीकुमार हैं, और वही पुरन्दर (इन्द्र) हैं। वही मित्र, वरुण, यम तथा धनद (कुबेर) भी हैं। (विमर्श: सोलह ऋत्विजों के नाम इस प्रकार हैं— १. ब्रह्मा, २. ब्राह्मणाच्छंसी, ३. आग्नीध्र और ४. पोता— ये चार ऋत्विज सम्पूर्ण वेदों के ज्ञाता होते हैं। ५. होता, ६. मैत्रावरुण, ७. अच्छावाक और ८. ग्रावस्तोता— ये चार ऋत्विज ऋग्वेदी होते हैं। ९. अध्वर्यु, १०. प्रतिप्रस्थाता, ११. नेष्टा और १२. उन्नेता— ये चार यजुर्वेदी होते हैं। १३. उद्‌गात्ना, १४. प्रस्तोता, १५. प्रतिहर्ता तथा १६. सुब्रह्मण्य— ये सामवेद के गायक होते हैं।)
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