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वृत्रगीता • अध्याय 2 • श्लोक 41
सोऽस्मादथ भ्रश्यति कालयोगात् कृष्णे तले तिष्ठति सर्वकृष्टे । यथा त्वयं सिद्धयति जीवलोक-स्तत् तेऽभिधास्याम्यसुरप्रवीर ॥
असुरों के प्रमुख वीर! वह जीव कालक्रम से अशुभ कर्म करके कभी-कभी मर्त्यलोक से भी नीचे गिर जाता है और सबसे निकृष्ट, तलप्रदेश की भाँति निम्नतम, कृष्णवर्ण (स्थावर योनि) में जन्म ग्रहण करके स्थित होता है। इस प्रकार उत्थान-पतन के चक्र में पड़े हुए इस जीवसमूह को जिस प्रकार सिद्धि (मुक्ति) प्राप्त होती है, वह मैं तुम्हें बता रहा हूँ।
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