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वृत्रगीता • अध्याय 2 • श्लोक 40
स देवलोके विहरत्यभीक्ष्णं ततश्च्युतो मानुषतामुपैति । संहारविक्षेपशतानि चाष्टौ मत्र्येषु तिष्ठत्यमृतत्वमेति ॥
वह जीव तत्पश्चात् बार-बार देवलोक में विहार करता है और वहाँ से च्युत होकर पुनः मनुष्ययोनि को प्राप्त होता है। इसके उपरान्त, सृष्टि और संहार के आठ सौ चक्रों तक मर्त्यलोक में स्थित रहता हुआ, अन्ततः अमृतत्व (मोक्ष अथवा जन्म-मरण से परे अवस्था) को प्राप्त करता है। (यह आवागमन का चक्र तभी तक चलता है, जब तक जीव को परमज्ञान या अनन्य भक्ति की प्राप्ति नहीं हो जाती, उसकी प्राप्ति होने पर तो वह मुक्त या परमात्मा को प्राप्त हो जाता है।)
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