वह जीव तत्पश्चात् बार-बार देवलोक में विहार करता है और वहाँ से च्युत होकर पुनः मनुष्ययोनि को प्राप्त होता है।
इसके उपरान्त, सृष्टि और संहार के आठ सौ चक्रों तक मर्त्यलोक में स्थित रहता हुआ, अन्ततः अमृतत्व(मोक्ष अथवा जन्म-मरण से परे अवस्था) को प्राप्त करता है।
(यह आवागमन का चक्र तभी तक चलता है, जब तक जीव को परमज्ञान या अनन्य भक्ति की प्राप्ति नहीं हो जाती, उसकी प्राप्ति होने पर तो वह मुक्त या परमात्मा को प्राप्त हो जाता है।)
पूरा ग्रंथ पढ़ें
वृत्रगीता के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
वृत्रगीता के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।