षड् जीववर्णाः परमं प्रमाणं कृष्णो धूम्रो नीलमथास्य मध्यम् ।
रक्तं पुनः सह्यतरं सुखं तु हारिद्रवर्णं सुसुखं च शुक्लम् ॥
जीवों के छह वर्ण(आध्यात्मिक अवस्थाएँ अथवा गुणाधारित स्तर) बताए गए हैं, जो उनके विकास का मापदण्ड हैं।
इनमें कृष्ण(काला) वर्ण सबसे निम्न अवस्था का सूचक है, उसके बाद धूम्र(धूसर) और मध्यवर्ती अवस्था नील(नीला) वर्ण की है।
इसके पश्चात् रक्त(लाल) वर्ण अपेक्षाकृत श्रेष्ठ और सुखद अवस्था का द्योतक है, जबकि हारिद्र(पीत) वर्ण अत्यन्त सुखमय अवस्था का सूचक है।
और शुक्ल(श्वेत) वर्ण को सर्वश्रेष्ठ, परम शुद्ध और उत्कृष्ट अवस्था माना गया है।
(विमर्श: जब तमोगुण की अधिकता, सत्त्वगुण की न्यूनता और रजोगुण की सम अवस्था हो, तब कृष्णवर्ण होता है। यह स्थावर सृष्टि का रंग माना गया है। तमोगुण की अधिकता, रजोगुण की न्यूनता और सत्त्वगुण की सम अवस्था होने पर धूम्रवर्ण होता है। यह पशु-पक्षी की योनि में जन्म लेने वाले प्राणियों का वर्ण माना गया है। रजोगुण की अधिकता, सत्त्वगुण की न्यूनता और तमोगुण की सम अवस्था होने पर नीलवर्ण होता है। यह मानवसर्ग का वर्ण बताया गया है। इसी में जब सत्त्वगुण की सम अवस्था और तमोगुण की न्यूनावस्था हो तो मध्यमवर्ण होता है। उसका रंग लाल होता है। इसे अनुग्रह सर्ग कहते हैं। जब सत्त्वगुण की अधिकता, रजोगुण की न्यूनता और तमोगुण की सम अवस्था हो तो हरिद्रा के समान पीतवर्ण होता है। यही देवताओं का वर्णन है, अतः इसे देवसर्ग कहते हैं। उसी में जब रजोगुण की सम अवस्था और तमोगुण की न्यूनता हो तो शुक्लवर्ण होता है। इसी को कौमारसर्ग कहा गया है।)
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