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वृत्रगीता • अध्याय 2 • श्लोक 31
षड् जीववर्णाः परमं प्रमाणं कृष्णो धूम्रो नीलमथास्य मध्यम् । रक्तं पुनः सह्यतरं सुखं तु हारिद्रवर्णं सुसुखं च शुक्लम् ॥
प्राणियों के वर्ण छः प्रकार के हैं - कृष्ण, धूम्र, नील, रक्त, हरिद्रा (पीला) और शुक्ल । इनमें से कृष्ण, धूम्र और नील वर्ण का सुख मध्यम होता है। रक्तवर्ण विशेष रूप से सहन करने योग्य होता है। हरिद्रा की-सी कान्ति सुख देने वाली होती है और शुक्लवर्ण अत्यन्त सुखदायक होता है। विमर्श - जब तमोगुण की अधिकता, सत्त्वगुण की न्यूनता और रजोगुण की सम अवस्था हो, तब कृष्णवर्ण होता है। यह स्थावर सृष्टि का रंग माना गया है। तमोगुण की अधिकता, रजोगुण की न्यूनता और सत्त्वगुण की सम अवस्था होने पर धूम्रवर्ण होता है। यह पशु-पक्षी की योनि में जन्म लेने वाले प्राणियों का वर्ण माना गया है। रजोगुण की अधिकता, सत्त्वगुण की न्यूनता और तमोगुण की सम अवस्था होने पर नीलवर्ण होता है। यह मानवसर्ग का वर्ण बताया गया है। इसी में जब सत्त्वगुण की सम अवस्था और तमोगुण की न्यूनावस्था हो तो मध्यमवर्ण होता है। उसका रंग लाल होता है। इसे अनुग्रह सर्ग कहते हैं। जब सत्त्वगुण की अधिकता, रजोगुण की न्यूनता और तमोगुण की सम अवस्था हो तो हरिद्रा के समान पीतवर्ण होता है। यही देवताओं का वर्णन है, अतः इसे देवसर्ग कहते हैं। उसी में जब रजोगुण की सम अवस्था और तमोगुण की न्यूनता हो तो शुक्लवर्ण होता है। इसी को कौमारसर्ग कहा गया है।
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