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वृत्रगीता • अध्याय 2 • श्लोक 64
वयं तु भृशमापन्ना रक्ता दुःखसुखेऽसुखे । कां गतिं प्रतिपत्स्यामो नीलां कृष्णाधमामथ ॥
हम लोग तो और भी अधिक आपत्ति से घिरे हुए हैं। दुःख-सुख से मिश्रित भाव में अथवा केवल दुःखमय भाव में आसक्त हैं। ऐसी दशा में पता नहीं हमें किस गति की प्राप्ति होगी? हम नीलवर्ण वाली मानव-योनि में पड़ेंगे या कृष्णवर्ण वाली स्थावर योनि से भी हीनदशा को जा पहुँचेंगे।
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