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वृत्रगीता • अध्याय 2 • श्लोक 37
स वै यदा सत्त्वगुणेन युक्त स्तमो व्यपोहन् घटते स्वबुद्धया । स लोहितं वर्णमुपैति नीलान् मनुष्यलोके परिवर्तते च ॥
जब वह जीव सत्त्वगुण से युक्त होकर अपनी बुद्धि के द्वारा तमोगुण का परित्याग करने का प्रयत्न करता है, तब वह लोहित वर्ण (रजस् और सत्त्व की प्रधानता वाली उच्चतर अवस्था) को प्राप्त करता है। और इसके पश्चात् वह नील वर्ण से सम्बद्ध अवस्थाओं को पार करते हुए मनुष्यलोक में विविध प्रकार से विचरण करता है।
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