स वै यदा सत्त्वगुणेन युक्त स्तमो व्यपोहन् घटते स्वबुद्धया ।
स लोहितं वर्णमुपैति नीलान् मनुष्यलोके परिवर्तते च ॥
वही जीव जब सत्त्वगुण से युक्त होता है, तब अपनी बुद्धि के द्वारा तमोगुण की प्रवृत्ति को दूर हटाता हुआ अपने कल्याण के लिये प्रयत्न करता है। उस समय सत्त्वगुण के बढ़ जाने पर वह रक्तवर्ण को प्राप्त होता है (इसी को अनुग्रह सर्ग कहा गया है, चित्त की विभिन्न वृत्तियों पर अनुग्रह करने वाले देवविशेष का ही नाम 'अनुग्रह' है)। जब सत्त्वगुण में कुछ कमी रह जाती है, तब वह जीव नीलवर्ण को प्राप्त होकर मनुष्य लोक में आवागमन करने लगता है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
वृत्रगीता के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
वृत्रगीता के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।