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वृत्रगीता • अध्याय 2 • श्लोक 58
तुरीयांशेन तस्येमं विद्धि केशवमच्युतम् । तुरीयार्धेन लोकांस्त्रीन् भावयत्येव बुद्धिमान् ॥
अपनी महिमा से कभी च्युत न होने वाले इन भगवान् श्रीकृष्ण को तुम उन श्रीनारायण के एक चतुर्थ अंश से सम्पन्न समझो। बुद्धिमान् श्रीकृष्ण अपने उस चतुर्थ अंश से ही तीनों लोकों की रचना करते हैं।
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