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वृत्रगीता • अध्याय 2 • श्लोक 16
एवं जातिशतैर्युक्तो गुणैरेव प्रसङ्गिषु । बुद्धया निवर्तते दोषो यत्नेनाभ्यासजेन ह ॥
इसी प्रकार, अनेक जन्मों तक सत्गुणों के संग और उनके अभ्यास में लगे रहने से, बुद्धि के द्वारा, तथा अभ्यासजनित महान् प्रयत्न से, दोष क्रमशः दूर हो जाते हैं।
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