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वृत्रगीता • अध्याय 2 • श्लोक 16
एवं जातिशतैर्युक्तो गुणैरेव प्रसङ्गिषु । बुद्धया निवर्तते दोषो यत्नेनाभ्यासजेन ह ॥
उसी प्रकार सैकड़ों जन्मों में स्त्री-पुत्र आदि के संसर्ग से युक्त तथा सत्त्व, रज और तम - इन तीनों गुणों द्वारा प्रवर्तित दोषसमूह बुद्धि तथा अभ्यासजनित यत्न से निवृत्त हो पाता है।
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