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वृत्रगीता • अध्याय 2 • श्लोक 25
बह्वाश्रयो बहुमुखो धर्मो हृदि समाश्रितः । स ब्रह्म परमो धर्मस्तपश्च सदसच्च सः ॥
बहुत-से वर्ण और आश्रम उनके आश्रय हैं, उनके अनेक मुख हैं। हृदय में आश्रित धर्म भी उन्हीं का स्वरूप है। वे ही ब्रह्म हैं। वे ही आत्मदर्शनरूप परम धर्म हैं। वे ही तप और सदसत्स्वरूप हैं।
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