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वृत्रगीता • अध्याय 2 • श्लोक 44
सप्तोत्तरं तत्र वसत्यनीशः संहारविक्षेपशतं सशेषम् । तस्मादुपावृत्य मनुष्यलोके ततो महान् मानुषतामुपैति ॥
वहाँ पहुँचकर भी जीव अभी पूर्णतः स्वाधीन नहीं होता और सृष्टि तथा संहार के एक सौ सात शेष चक्रों तक उस अवस्था में स्थित रहता है। इसके पश्चात् वहाँ से लौटकर वह पुनः मनुष्यलोक में आता है। तब वह महान् मनुष्यत्व (उच्चतम मानवीय एवं आध्यात्मिक अवस्था) को प्राप्त करता है।
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