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वृत्रगीता • अध्याय 2 • श्लोक 65
भीष्म उवाच- शुद्धाभिजनसम्पन्नाः पाण्डवाःसंशितव्रताः । विहृत्य देवलोकेषु पुनर्मानुषमेष्यथ ॥
भीष्मजी ने कहा - युधिष्ठिर! तुम सभी पाण्डव विशुद्ध कुल से सम्पन्न और तीक्ष्ण व्रतों का भलीभाँति पालन करने वाले हो; अतः देवताओं के लोकों में विहार करके पुनः मनुष्य-शरीर को ही प्राप्त करोगे।
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