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वृत्रगीता • अध्याय 2 • श्लोक 20
स वै सर्वेषु भूतेषु क्षरश्चाक्षर एव च। एकादशविकारात्मा जगत् पिबति रश्मिभिः ॥
वे ही सम्पूर्ण प्राणियों में क्षर और अक्षररूप से विद्यमान हैं। ग्यारह इन्द्रियों का जो वैकारिक सर्ग है, वह भी उन्हीं का स्वरूप है। वे अपनी चैतन्यमयी किरणों द्वारा सम्पूर्ण जगत्में व्याप्त हो रहे हैं। विमर्श - श्रीविष्णुपुराण में तीन प्रकार की प्राकृत सृष्टि बतायी गयी है - पहली महत्तत्त्व की सृष्टि है, जिसे यहाँ 'क्षर' शब्द से कहा गया है। दूसरी भूत-सृष्टि मानी गयी है, जो तन्मात्राओं की सृष्टि है। यहाँ 'भूतेषु' पद के द्वारा उसी की ओर संकेत किया गया है। 'एकादशविकारात्मा' इस पद के द्वारा तीसरी सृष्टि का निर्देश किया गया है, जिसे वैकारिक अथवा ऐन्द्रियक सर्ग भी कहते हैं। इसमें पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय और एक मन - इन ग्यारह तत्त्वों की रचना हुई है।
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