वही भगवान् समस्त प्राणियों में क्षर(नश्वर) और अक्षर(अविनाशी)— दोनों रूपों में स्थित हैं।
वे एकादश विकारों(पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ और मन) से युक्त होकर अपनी रश्मियों(शक्तियों) द्वारा इस समस्त जगत् का अनुभव और संचालन करते हैं।
(विमर्श: श्रीविष्णुपुराण में तीन प्रकार की प्राकृत सृष्टि बतायी गयी है— पहली महत्तत्त्व की सृष्टि है, जिसे यहाँ 'क्षर' शब्द से कहा गया है। दूसरी भूत-सृष्टि मानी गयी है, जो तन्मात्राओं की सृष्टि है। यहाँ 'भूतेषु' पद के द्वारा उसी की ओर संकेत किया गया है। 'एकादशविकारात्मा' इस पद के द्वारा तीसरी सृष्टि का निर्देश किया गया है, जिसे वैकारिक अथवा ऐन्द्रियक सर्ग भी कहते हैं। इसमें पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय और एक मन — इन ग्यारह तत्त्वों की रचना हुई है।)
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