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वृत्रगीता • अध्याय 2 • श्लोक 51
शुद्धां गतिं तां परमां परैति शुद्धेन नित्यं मनसा विचिन्वन् । ततोऽव्ययं स्थानमुपैति ब्रह्म दुष्प्रापमभ्येति स शाश्वतं वै ॥
जो साधक सदा शुद्ध मन से उस विशुद्ध परमगति का अनुसन्धान करता है, वह उसे अवश्य प्राप्त कर लेता है। तदनन्तर अविकारी, दुर्लभ एवं सनातन ब्रह्मपद को प्राप्त करके वह उसी में प्रतिष्ठित हो जाता है।
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