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वृत्रगीता • अध्याय 2 • श्लोक 32
परं तु शुक्लं विमलं विशोकं गतक्लमं सिद्धयति दानवेन्द्र । गत्वा तु योनिप्रभवाणि दैत्य सहस्त्रशः सिद्धिमुपैति जीवः ॥
दानवराज! शुक्लवर्ण निर्मल, शोकहीन, परिश्रमशून्य होने के कारण सिद्धिकारक होता है। दितिकुलनन्दन! जीव सहस्रों योनियों में जन्म ग्रहण करने के बाद मनुष्य योनि में आकर कभी सिद्धि-लाभ करता है।
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