हे विभो! जीव जिस प्रकार यथावत् प्रवृत्त होते हैं और जिस अवस्था में जाकर स्थित होते हैं, उसका वर्णन मैं तुम्हें क्रमपूर्वक करूँगा।
अतः तुम यहाँ एकाग्रचित्त होकर उसे सुनो।
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