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वृत्रगीता • अध्याय 2 • श्लोक 18
यथावत् सम्प्रवर्तन्ते यस्मिस्तिष्ठन्ति वा विभो। तत् तेऽनुपूर्व्या व्याख्यास्ये तदिहैकमनाः शृणु ॥
प्रभो! जिस प्रकार वे कर्म में प्रवृत्त होते तथा जिस निमित्त से उसमें स्थित होते हैं और जिस अवस्था में उससे निवृत्त हो जाते हैं, वह सब मैं तुमसे क्रमशः बताऊँगा। तुम उसे यहाँ एकाग्रचित्त होकर सुनो!
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