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वृत्रगीता • अध्याय 2 • श्लोक 28
नानाभूतस्य दैत्येन्द्र तस्यैकत्वं वदत्ययम् । जन्तुः पश्यति विज्ञानात् ततो ब्रह्म प्रकाशते ॥
दैत्यराज! अनेक रूपों में प्रकट हुए उन परमात्मा की एकता का यह वेद प्रतिपादन करता है। जीव विज्ञान बल से ही ब्रह्म का साक्षात्कार करता है। उस समय उसकी बुद्धि में वह ब्रह्म प्रकाशित हो जाता है।
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