हे दैत्येन्द्र! यद्यपि वह परम तत्त्व अनेक रूपों और भिन्न-भिन्न भूतों के रूप में प्रकट होता है, तथापि यह शिक्षण उसके एकत्व का ही प्रतिपादन करता है।
जब जीवविज्ञान(तत्त्वज्ञान एवं प्रत्यक्ष अनुभूति) के द्वारा इस सत्य का साक्षात्कार करता है, तब उसके लिए ब्रह्म स्वयं प्रकाशित हो जाता है।
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