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वृत्रगीता • अध्याय 2 • श्लोक 13
लीलयाल्पं यथा गात्रात् प्रमृज्यादात्मनो रजः । बहुयत्नेन महता दोषनिर्हरणं तथा ॥
जैसे अपने शरीर में लगी हुई थोड़ी-सी धूल को मनुष्य साधारण चेष्टा से खेल-खेल में ही झाड़-पोंछ देता है, उसी प्रकार बारम्बार किये हुए महान् प्रयत्न से वह अपने राग-द्वेष आदि दोषों को भी दूर कर सकता है।
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