जिस प्रकार मनुष्य सहज रूप से अपने शरीर से थोड़ी-सी धूल को पोंछकर हटा देता है,
उसी प्रकार, परन्तु अत्यन्त महान् प्रयत्न और साधना के द्वारा, दोषों का निवारण किया जाता है।
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