हारिद्रवर्णे रक्ते वा वर्तमानस्तु पार्थिव ।
तिर्यगेवानुपश्येत कर्मभिस्तामसैर्वृतः ॥
हे पार्थिव! यदि कोई जीव हारिद्र अथवा रक्त वर्ण की अवस्था में स्थित होते हुए भी तामस कर्मों से आच्छन्न हो जाता है,
तो वह पुनः तिर्यक् गति(पशु-पक्षी आदि की योनियों) को प्राप्त होता हुआ देखा जाता है।
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