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वृत्रगीता • अध्याय 2 • श्लोक 10
बाहो चाभ्यन्ते चैव कर्मणोर्मनसि स्थितः। निर्मलीकुरुते बुद्धया सोअमुत्रानन्त्यमएनुते॥
जो बाह्य (यज्ञ आदि) और आभ्यन्तर (शम, दम आदि) कर्मों में प्रवृत्त होकर मन के विषय में स्थिरता प्राप्त करके अर्थात् मन को स्थिर करके बुद्धि के द्वारा उसे निर्मल बनाता है, वह परलोक में अक्षय सुख (मोक्ष) को प्राप्त कर लेता है।
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