जो पुरुष बाह्य और आन्तरिक दोनों प्रकार के कर्मों को मन में स्थित होकर (मन के द्वारा नियंत्रित करके)बुद्धि से निर्मल करता है,
वह इस लोक और परलोक में अनन्त फल(परम पद) को प्राप्त करता है।
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