अष्टौ च षष्टि च शतानि चैव मनोनिरुद्धानि महाद्युतीनाम् ।
शुक्लस्य वर्णस्य परा गतिर्या त्रीण्येव रुद्धानि महानुभाव ॥
महानुभाव वृत्रासुर! प्रकृति, महत्तत्त्व, अहंकार और पंचतन्मात्राएँ - ये आठ तथा दूसरे साठ तत्त्व और इनकी जो सैकड़ों वृत्तियाँ हैं - ये सब महातेजस्वी योगियों के मन के द्वारा अवरुद्ध की हुई होती हैं तथा सत्त्व, रज और तम इन तीनों गुणों को भी वे अवरुद्ध कर देते हैं। अतः शुक्लवर्ण वाले (सनकादिकों के समान सिद्ध) पुरुष को जो उत्तम गति प्राप्त होती है, वही उन योगियों को मिलती है।
विमर्श - पाँच ज्ञानेन्द्रिय और पाँच कर्मेन्द्रिय - ये दस इन्द्रियाँ सात्त्विक, राजसिक और तामसिक तथा जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति के भेद से प्रत्येक छः-छः प्रकार की होती हैं। इस प्रकार इनके साठ भेद हो जाते हैं।
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