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वृत्रगीता • अध्याय 2 • श्लोक 33
गतिं च यां दर्शनमाह देवो गत्वा शुभं दर्शनमेव चापि । गतिः पुनर्वर्णकृता प्रजानां वर्णस्तथा कालकृतोऽसुरेन्द्र ॥
भगवान् ने जिस गति (आध्यात्मिक अवस्था या प्राप्ति) का वर्णन किया है, उसे प्राप्त करके जीव शुभ दर्शन (शुद्ध तत्त्वज्ञान एवं सम्यक् अनुभूति) को भी प्राप्त करता है। हे असुरेन्द्र! प्राणियों की गति उनके वर्ण (आध्यात्मिक स्थिति) के अनुसार होती है, और वह वर्ण भी काल (दीर्घकालीन कर्म और संस्कारों की परिपक्वता) के प्रभाव से निर्धारित होता है।
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