मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
वृत्रगीता • अध्याय 2 • श्लोक 33
गतिं च यां दर्शनमाह देवो गत्वा शुभं दर्शनमेव चापि । गतिः पुनर्वर्णकृता प्रजानां वर्णस्तथा कालकृतोऽसुरेन्द्र ॥
असुरेन्द्र! देवराज इन्द्र ने मंगलमय तत्त्वज्ञान प्राप्त करके हमारे निकट जिस गति और दर्शन-शास्त्र का वर्णन किया है, वह प्राणियों की वर्णजनित गति है अर्थात् शुक्लवर्ण वालों को वही सिद्धि प्राप्त होती है। वह वर्ण कालकृत माना गया है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
वृत्रगीता के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

वृत्रगीता के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें