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वृत्रगीता • अध्याय 2 • श्लोक 27
ते पृथग्दर्शनास्तस्य संविदन्ति तथैकताम् । एकस्य विद्धि देवस्य सर्वं जगदिदं वशे ॥
उनका दर्शन पृथक् पृथक् होने पर भी वे अपनी एकता को जानते हैं। तुम भी इस सम्पूर्ण जगत्‌ को एक परमात्मदेव के ही अधीन समझो।
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