मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
वृत्रगीता • अध्याय 2 • श्लोक 54
प्रवृत्तमेतद् भगवन् महर्षे महाद्युतेश्चक्रमनन्तवीर्यम् । विष्णोरनन्तस्य सनातनं तत् स्थानं सर्गा यत्र सर्वे प्रवृत्ताः । स वै महात्मा पुरुषोत्तमो वै तस्मिन् जगत् सर्वमिदं प्रतिष्ठितम् ॥
हे भगवन् महर्षे! अब मैं समझ गया हूँ कि यह अनन्त पराक्रमशाली और महातेजस्वी भगवान् विष्णु का ही वह सनातन और अनन्त चक्र है, जो निरन्तर प्रवृत्त रहता है। वही वह शाश्वत स्थान है, जहाँ से समस्त सृष्टियाँ उत्पन्न होती हैं और जिसमें वे पुनः स्थित हो जाती हैं। वास्तव में वही महात्मा, वही पुरुषोत्तम हैं, और इसी में यह सम्पूर्ण जगत् प्रतिष्ठित है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
वृत्रगीता के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

वृत्रगीता के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें