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अध्याय 3 — तृतीयोपदेश
घेरण्ड संहिता
99 श्लोक • केवल अनुवाद
मुद्राओं के प्रकार - महामुद्रा, नभोमुद्रा, उड्डीयान मुद्रा, जलंधर, मूलबन्ध, महाबन्ध, महावेध, खेंचरी (ये सब आठ मुद्रायें हैं)।
विपरीतकरी, योनि, वज्राणी, शक्तिधारिणी, तड़ागी, मांडवी, शांभवी, धारणा (यहाँ तक सोलह मुद्रायें हुई)।
(पुनः सोलह के बाद) अश्विनी, पाशिनी, काको, मातंगी, भुजंगिनी, ये कुल २५ मुद्रा कही जाती हैं, ये योगियों के लिये सिद्धिदात्री हैं।
(भगवान शिव पार्वती से कहते हैं-) हे देवी! मैने तुम्हारे सम्मुख मुद्राओं का यह वृत्त कहा है, जिसके जानने से सब प्रकार की सिद्धि प्राप्त हो जाती हैं।
ये मुद्रायें गोपनीय हैं, जिस किसी योग्य-अयोग्य को ये देय नहीं हैं। योगियों के लिये प्रातिदायक तथा देवताओं के लिये भी ये दुर्लभ हैं। (समीक्षा - गोपनीय, अदेय, दुर्लभ आदि कहने के पीछे विशेष बात यह है कि हर कोई इन्हें कर ही नहीं सकता हैं। यदि सीख भी ले तो वह बिना नियम और व्यवस्था के और इन्हें या अज्ञानवश पवित्रता और समयादि के बिना करके इनसे लाभ की बजाय हानि ही उठायेंगे। अतएव अपात्र को ये मुद्रायें अदेय हैं। अनेक मुद्राओं की साधना भी कठिन है, जिन्हें देवसदृश जन भी करने में नियम का ध्यान नहीं रख पाते हैं। अत: मात्र योगीजन ही इन्हें कर पाते हैं, यह भाव हैं)
महामुद्रा - मलद्वार को वाम एड़ी पर दृढता के साथ दबाकर दायें पैर को फैलाकर हाथ से पैर की अंगुली को धारण करें।
तत्पश्चात् कण्ठ का संकोचन (सिकोड़) करके भ्रुवो के मध्य में देखना चाहिये। यह विद्वानों के द्वारा महामुद्रा के नाम से अभिहित की जाती है।
इस महामुद्रा के अत्यधिक सेवन से क्षमज खाँसी, गुदावर्त (गुदा के फोड़े) तापतिल्ली, जीर्णज्वर, तथा अन्य सब रोग नष्ट होते हैं।
नभोमुद्रा - जहाँ-जहाँ भी योगी किसी कार्य में स्थित हो, तब तब सदैव ऊपर की ओर जिह्वा से स्थित होकर वायु को धारण करे। योगियों के रोगों का नाश करने वाली यह नभोमुद्रा होती है।
उड्डीयान बंध - उदर में नाभि के ऊर्ध्वभाग को पश्चिम तान (द्वार) को समान रूप से सिकोड़ना चाहिये। अर्थात् मध्यस्थ नाड़ीचक्र को सिकोड़कर उठाये। इसी को उड्डीयान बन्ध कहते हैं, गजरुप मृत्यु के लिये साक्षात् सिहँ यही उड्डीयान बंध होता है।
समस्त मुद्राबंधो में उड्डीयान बंध विशिष्ट माना जाता है। इस उड्डीयान बंध के साधन से स्वयं ही मुक्ति होती है।
अब जालंधर बंध - कण्ठ का संकोचन करके ठोड़ी को हृदय पर रखना चाहिये। इसी जालंधर बंध के करने से सोलह प्रकार का आधार बंध होता है। जालंधर महामुद्रा मृत्यु का भी क्षय करने वाली है।
सिद्ध हुआ जालंधर बंध योगियों को सिद्धिदायक है। छह मास तक जो अभ्यास करता है, वह सिद्ध हो जाता है, इसमें संशय नहीं है।
मूलबंध - वाम पैर की एड़ी से गुह्यस्थान (योनिस्थान) का आकुंचन करे, पुन: नाभिग्रन्थी को मेरुदण्ड से यत्नपूर्वक दबाये।
पुन: लिङ्ग को दायीं एड़ी से दृढ़ता से दबाये, यह जरा को विनाशक मुद्रा मूलबंध कही जाती है।
संसार सागर से पार होने को जो जन इच्छा करता है, वह एकांत स्थान में इस मुद्रा में स्थितमन होकर अभ्यास करें।
इस बंध के अभ्यास से अवश्य ही वायु की सिद्धि होती है। अतः निरालस्य होकर यत्नपूर्वक इसकी साधना करनी चाहिये।
बायें पैर की एड़ी से पायुमूल का निरोध करना चाहिये तथा योगीजन को दायें पैर से बायीं एड़ी को प्रयत्नपूर्वक दबाना चाहिये।
इसके बाद शनै:-शनै: गुह्मस्थान का चाल न करें-चलायें और आकुञ्चन या सिकोड़ने की क्रिया करें। तथा प्राणवायु जालन्धर में धारण करें। यही महाबन्ध कहलाता है।
जरा और मरण को दूर करने वाली महाबंध नामक यह मुद्रा सबसे श्रेष्ठ बंध है। इसके प्रसाद से सब इच्छाओं को साधना चाहिये।
महावेध - जिस प्रकार पुरुष के बिना नारी का रूप, यौवन और सुन्दरता (निरर्थक है), उसी प्रकार महावेध मुद्रा के बिना मूलबन्ध और महाबंध होते हैं।
प्रथम महाबंध मुद्रा को करे, पुन: उड्डीयान बंध मुद्रा द्वारा कुंभक प्राणायाम को करना चाहिये। इस प्रकार यही महाबंध मुद्रा कही जाती है, जो योगियों को सिद्धिदायक है।
महाबंध और मूलबंध के सहित महावेध मुद्रा को योग को जो प्रतिदिन करता है, वह योगी योगज्ञानी है।
वह न मृत्यु से भय करता है और न उसे जरा आती है। अत: योगी विशिष्टों द्वारा यह महावेधमुद्रा गोपनीय मानी गयी है।
खेचरी मुद्रा - जिह्वा के नीचे की नाड़ी को छिन्न करके रसना को सदैव चलाना चाहिये। जिह्वा को मक्खन से दुहा करना चाहिये और लौहयन्त्र से खींचना चाहिये।
इस प्रकार नित्य अभ्यास से जिह्वा लम्बी हो जाती है। जब वह भ्रुवों के मध्य में पहुँच जाये तो खेचरी की ओर ले जाती है।
पुन: जिह्वा को तालु के मध्य में शनै: शनै: प्रवेश कराना चाहिये। जिह्वा को कपाल गुहर (तालु के मध्यस्थ गड्ढे) में उल्टी करके प्रविष्ट करके भ्रुवो के मध्य में दृष्टि को स्थित करे, यही खेचरी मुद्रा होती है।
इस मुद्रा से न तो मूर्च्छा, न क्षुक्षा, न तृष्णा, न आलस्य ही उत्पन्न होता है। और न रोग, न जरा, न मृत्यु ही होती है। अपितु शरीर देवता जैसा हो जाता है।
शरीर को न अग्नि जला पाती है, न पवन सुखा पाती है, न जल गला पाता है और न सर्प डस सकता है।
शरीर में सुन्दरता आ जाती है, और निश्चय ही समाधि सिद्ध होती है। कपाल और मुख के संयोग होने पर रसना के रसों की प्राप्ति हो जाती हैं।
अनेक प्रकार के रसों का दिन-दिन अद्भुत आनंद प्राप्त होता है। प्रांरभ में लवण, क्षार का और तिक्त (तीखे) और कषाय का रसानुभव होता है।
तदुपरान्त नवनीत (मक्खन), घृत, दुग्ध, दही, मधु, द्राक्षा, और अमृत जैसे रसों की उत्पत्ति हो जाती है।
विपरीतकरी मुद्रा - नाभि के मूल में सूर्य बसते हैं और तालु के मूल में चन्द्रमा। जब सूर्य अमृत को ग्रस लेता हैं तब नर मृत्यु के वश होता है। (समीक्षा - (सूर्य नाभि में स्थित है तथा अमृत सहस्रारचक्र में (ब्रह्मरंध्र में) है। सूर्य द्वारा अमृतपान करने से मनुष्य की स्थिति में परिवर्तन हो जाता है।)
सूर्य को ऊपर की ओर उठाना चाहिये तथा चन्द्रमा को नीचे की ओर ले आना चाहिये। इसी का नाम विपरीतकरी मुद्रा है, जो सब तंत्रं में गोपनीय कही गयी है।
विपरीतकरी मुद्रा - भूमि पर सिर रखकर हाथों को नीचे रखकर पैरों को ऊर्ध्व करके विपरीतकरी मुद्रा मानी गयी है।
यह मुद्रा नित्य साधनी चाहिये और जरामत्यु को नष्ट करना चाहिये। वह सब लोकों में सिद्ध होता है और प्रलय में भी दुःखी नहीं होता।
अब योनिमुद्रा - पहले सिद्धासन लगाकर कान, नेत्र, नासिका, मुख को अंगुष्ठ, तर्जनी, मध्यमा, अनामिकाओं से साधना (ढ़कना) चाहिये।
पुन: काकी मुद्रा से प्राणवायु को खींचकर अपान वायु में योजित करे। फिर सुधीजन षट् चक्रों का ध्यान करे और 'हुं' और 'हंस' इन दो मंत्रों से जो साक्षात् भुजंगिनी है, उस देवी (कुंडलिनी) को जगाये तथा जीव के सहित इस शक्ति (कुंडलिनी) को उठाकर सहस्रकमल (सहस्रारचक्र) में ले जाये।
इससे स्वयं शक्तिवान् होकर परं कल्याण का संयोग पाकर अनेक प्रकार के सुख, विहार और परं आनंद का चिन्तन करता हैं।
शिव (कल्याणमय) शक्ति के संयोग से भूमि पर एकान्त की भावनां करनी चाहिये। स्वयं परमानंद स्वरूप होकर 'अहं तत्व ही ब्रह्म है' यह भाव तब संभव होता है।
योनिमुद्रा परं गोपनीय है। यह देवताओं को भी दुर्लभ हैं। सब प्रकार के लाभों की सिद्धि इससे संभव होती है और वही जन वस्तुत: समाधिस्थ होता है।
योनिमुद्रा - ब्रह्मघाती, भ्रूणहत्यारा, मद्यपायी, गुरुपत्नी सेवी जैसे (पामरजन भी) योनिमुद्रा के पालन से इन पापों से लिप्त नहीं होते हैं अर्थात् इन पापों के दुष्प्रभाव से बहुत हद तक दूर हो जाते हैं।
जो भी घोर पाप और उपपाप हैं, वे सब योनिमुद्रा के (विधिवत) पालन से नष्ट हो जाते हैं। अत: यदि मुक्ति की इच्छा करनी है तो इस द्रा का अभ्यास करना चाहिये।
वज्रोणिमुद्रा - कि करतलों को धरा पर रख करके दोनों पैरों और सिर को ऊपर उठाये। शक्ति के जागरण के लिये तथा चिरजीवन (दीर्घजीवन) पाने के लिये मुनिजन वज्रोणिमुद्रा को कहते हैं।
योगशास्त्र में यह योगियों की मुक्तिकारक वज्रोणि मुद्रा है। यह योगों में परं हितकारी और योगियों को सिद्धि देने वाली है।
इस योग की कृपा से निश्चय ही बिन्दु सिद्धि (वीर्यसिद्धि) होती हैं और इस महायत्न बिन्दुसिद्धि के हो जाने पर भूतल पर कौन सा कार्य हे जो सिद्ध नहीं होता।
भोगों से युक्त पुरुष भी यदि इस मुद्रा का आचरण करता हैं, तो निश्चय ही सकल सिद्धि वह प्राप्त करता है।
शक्तिचालनी मुद्रा - आत्मशक्ति मूलाधार में (शरीर में) सबसे बड़ा देवता - कुंडली शयन स्थिति में सर्पाकार साढ़े तीन वलयों (गोलाकारों) से युक्त है।
जब तक यह कुंडली शयनावस्था में है, तब तक जीव पशु के समान रहता है, तब तक ज्ञान भी नहीं होता है, (भले ही) कोटि उपाय किये जायें।
जिस प्रकार कुंचिका से बंद द्वार को हठात् खोला जाता है, उसी प्रकार कुंडलिनी के जागने पर ब्रह्मद्वार को (भेदकर) जानना चाहिये।
नाभिस्थान को वस्त्र से लपेट कर किन्तु नग्न होकर बाहर (सार्वजनिक रूप से) नहीं, अपितु गोपनीय गृह में स्थित होकर शक्तिचालन का अभ्यास करना चाहिये।
एक हाथ लम्बा तथा चार अंगुल चौड़ा कोमल, श्वेत और सूक्ष्म (बारीक) वस्त्र नाभि से लपेटे। इस प्रकार वस्न को पुनः कटिभाग में बॉँधना चाहिये।
भस्म से शरीर को लिप्त करके पुन: सिद्धासन लगाना चाहिये। पुन: नासाछिद्रों (दोनों) से वायु खींचकर अपानवायु के साथ मिलाना चाहिये।
जब तक वायु सुषुम्ना नाड़ी के अन्दर जाकर प्रकाशित हो, तब तक गुहास्थान (मलद्वार) का अश्विनी मुद्रा से धीरे-धीरे संकोचन करना चाहिये।
तब श्वास वायु को रोककर कुंभक श्वास को धारण करे तो कुंडलिनी उर्ध्वमार्ग की ओर प्राप्त होती है - उठती है।
विना शक्तिचालनी के योनिमुद्रा सिद्ध नहीं होती, शक्तिचालनी के अभ्यास को पहले करें, पुन: योनिमुद्रा का अभ्यास करें।
(घेरण्ड ऋषि कहते हैं--) हे चण्डकापालि! इस प्रकार शक्तिचालन मुद्रा मेने तुम्हें बतायी। यह गोपनीय है, दिन-दिन इसका अभ्यास करना चाहिये।
यह मुद्रा परं गोपनीया है और जरामरण का नाश करती है। अतः सिद्धि चाहने वाले योगियों को इसका अभ्यास करना चाहिये।
जो योगी नित्य इसका अभ्यास करता है, उसके हाथ में सिद्धि आ जाती है। उसे विग्रह सिद्धि हो जाती है और उसके रोगों का क्षय हो जाता है।
पश्चिमोत्तान करके उदर को तालाब की आकृति के समान बनाये, यह ताडागी मुद्रा जरामृत्यु विनाशिनी है।
मांडूकी मुद्रा - मुख को बंद करके जिहामूल का चालन करे, पुन: धीरे-धीरे अमृत का पान करे (सहस्रारचक्र के परमानंद का ध्यान करे) इसे विद्वानों ने मांडूकी मुद्रा कहा है।
जो भी मांडूकी मुद्रा को करता है - वलित और पलित (त्वचा का सिकुड़ना तथा बालों का श्वेत होना) इससे नहीं होता, तथा नित्य यौवन बना रहता है और केश पकते नहीं है।
शांभवी मुद्रा - भोंहों के मध्य में दृष्टि डालते हुए सर्वदा मन को आत्मा में रमण करते हुए निरीक्षण करना चाहिये। यह सब विधानों में गोपनीया शांभवी मुद्रा है।
वेद, शास्र और पुराण इस मुद्रा के समक्ष सामान्य गणिका जैसे हैं (गौण हैं) जबकि यह शांभवी मुद्रा कुलवधु के समान गोपनीय है।
जो जन शांभवी मुद्रा को जानता हैं, वह आदिनाथ है, वही स्वयं नारायण स्वरूप हे, और वही सृष्टिकर्ता ब्रह्मा हैं।
शांभवी मुद्रा को (तत्वतः) जो जानता है, वह साक्षात् ब्रह्म स्वरूप है। यह पूर्ण सत्य है, अन्यथा की संभावना नही है। (समीक्षा - भावार्थ यह है कि शांभवी मुद्रा तन, मन, हृदय को परंशान्ति प्रदान करने वाली है। सब संतापों-तनावों को शांत करने वाली है। और जब मनुष्य के सब तनाव-घोर अंशाति शांत हो जायेगी तो ब्रह्मशक्ति (प्रजनन शक्ति) विष्णुशक्ति (परिवार समाज आदि की पालनाशक्ति) आदि विलक्षण और सुदृढ़ शक्तियाँ मनुष्य प्राप्त करता हैं।)
पंचधारणा मुद्रा - इस प्रकार शांभवी मुद्रा कही गयी, अब पंचधारण मुद्रा को सुनो। पंचधारणाओं को प्राप्त करके मनुष्य इस भूतल पर क्या नही प्राप्त कर सकता?
इससे नरदेंह का स्वर्गो में गमनागमन होता है। उसकी मनोगामी गति हो जाती है और खेचरत्व सिद्धि प्राप्त हो जाती है। यह सत्य है।
भूमि का जो तत्व हरिताल (हल्दी) जैसा पीला है, लकार से युक्त है, आकार चोकोर है, ऐसे उन (वेदास्रं) कमलासन ब्रह्मा के सहित हृदय में ध्यान करे। तब प्राणवायु को खींचकर पाँच घटी (दो घण्टा) तक उसे धारण करे। यह स्तंभकरी अधोधारणा भी कही जाती है। इससे धरती पर विजय हो जाती है।
(इसका फल कहते हैं) प्रतिदिन जो जन पार्थिवीधारण को करता है, वह मृत्युञ्जय हो जाता है, वह सिद्ध हो भूमि पर विचरता है।
इसका वर्ण शंख और चन्दमा जैसा सुन्दर, कुन्दपुष्प जैसा धवल है। शोभायमान वकार बीज से युक्त अमृत की संज्ञा वाला है, जो सदा ही विष्णु शक्ति से युक्त है या विष्णु इसके देवता हैं। (इस स्वरूप का ध्यान जल तत्व में करते हुए) प्राण को खींचकर पाँच घटी (२ घण्टे) तक कुंभक में स्थिर हो, यही दुःसह तापों को नष्ट करने वाली आंभसी धारणा होती है।
इस श्रेष्ठ आम्भसी मुद्रा को जो जानता है, वह योगज्ञानी है। गम्भीर जल में उसका कभी मरण संभव नहीं होता।
यह श्रेष्ठ मुद्रा प्रयत्नपूर्वक गोपनीय है। इसके प्रकाश से सिद्धि की हानि होती है, यह मैं सत्य कहता हूँ।
आग्नेयी मुद्रा - (यह मुद्रा अग्नितत्व में स्थित है) इसका स्थान नाभि और इन्द्रगोप (भगवान की गाय-बरसाती लाल रंग का एक गोल कीड़ा) जैसा इसका तीन कोण वाला वर्ण है, तेजयुक्त दीप्त अरुण जैसी आभा है और रुद्र इसके देवता है। (इस स्वरूप का प्राणों को रोककर कुंभक में पाँच घटी (२घण्टा) तक चित्त में ध्यान करे। इससे संसार का भय दूर होता है, यह वैश्वानरी (आग्नेयी) धारणा है।
प्रदीप्त और जलती हुई अग्नि में यदि साधक गिर जाये तो इस मुद्रा के प्रसाद से वह जीवन धारण करता है, न कि मृत्यु।
वायवी धारणा - इसका वर्ण भिन्न अंजन पुंज के समान, धुएँ के समान है, सत्व इसका गुण और यकार बीज है। स्वयं ईश्वर इसके देवता हैं। इसी स्वरूप का प्राणों को रोककर पाँचघटी (२ घण्टा) तक चित्त में ध्यान करे। आकाश में गमन इसी वायवी धारणा से होता है।
यह श्रेष्ठ वायवी मुद्रा जरामृत्यु विनाशिनी है, इसके कारण वायुकोष से मृत्यु नहीं होती तथा यह आकाशगमन को देने वाली होती है।
जिस किसी भी शठ या भक्तिहीन को इसे नहीं देना चाहिये। अन्यथा देने पर सिद्धि की हानि हो जाती है - यह सत्य कहता हूँ।
आकाशीधारणाविधि - इसका वर्ण सिन्धु के जल के समान परं विस्तीर्ण भासित है। शिवदेवता सहित हकार इसका बीज है। प्राणों का पाँच घटी तक कुंभक में संयोजन करके इस स्वरूप का ध्यान करे तो यह आकाशी मुद्रा मोक्षद्वार का भेदन करने वाली होती है।
जो साधक आकाशीमुद्रा की पूरी जानकारी से परिपूर्ण रहता है वही सही रूप में योग को पहचानने वाला है, उसकी काल आने पर भी मृत्यु नही होती और प्रलय होने पर भी वह डगमगाता नहीं है ज्यों का त्यों स्थिर रहता है।
गुदाद्वार का संकोचन (सिकोड़ना) तथा फैलाना बार-बार करे। यही अश्विनी मुद्रा है, जो शक्ति देने वाली है।
अश्विनी मुद्रा गुदारोगों को नष्ट करने वाली है। बल और पुष्टि करने वाली तथा अकालमृत्यु को हरने वाली है।
पाशिनी मुद्रा - कण्ठ और पीठ में दोनों पैरों को डाले और दृढ़ता से इस आसन को बाँधे, यही पाशिनि मुद्रा है, जो कुंडलिनी शक्ति को जगाने वाली है।
पाशिनी मुद्रा अत्यधिक बल और पुष्टि देने वाली है। सिद्धि चाहने वाले साधकों द्वारा इसे प्रयत्नपूर्वक साधना चाहिये।
काकीमुद्रा विधि - काकचंचु (कौवे जैसी चौंच) के मुख को करके धीरे-धीरे वायु को पान करे। यह सब रोग विनाशिनी काकी मुद्रा होती है।
काकीमुद्रा सब तन्त्रों में गोपनीय है। इसके प्रसाद से काकवत् नीरोग हो जाता है।
कण्ठ तक मग्न जल में स्थित होकर नासिकाछिद्रों से जल ग्रहण करे, पुन: मुख से निकाल दे तथा पुन: मुख से ग्रहण करना चाहिये।
पुन: उसका नासाछिद्रों से रेचन करे। यदि पुन:-पुन: ऐसा करे तो मातंगिनी मुद्रा जरामृत्यु का नाश करती है।
विरल निर्जन देश में एकाग्रमन से स्थित होकर मातंगिनी मुद्रा को करे तो हाथी के समान बली होता है।
वह योगी जहाँ-जहाँ स्थित होगा, वहाँ-वहाँ अत्यंत सुख को ग्रहण करता है। अत: सब प्रयत्नो से इसे साधना चाहिये।
भुजंगिनी मुद्रा - मुख को कुछ फैलाकर कण्ठ से वायु को पीना चाहिये। वह जरामृत्यु विनाशक भुजंगिनी मुद्रा होती है।
उदर में जो अजीर्णादि विशिष्ट रोग हैं, उन सबको, जहाँ भुजंगिनी मुद्रा होती है, शीघ्र ही समाप्त करती है।
घेरण्ड ऋषि बोले - हे चंडकापालि! यह मुद्राविवरण मैंने तुमसे कहा है। यह सब सिद्धजनों का प्रिय और जरामृत्यु का विनाशक होता है।
शठ या भक्तिहीन जिस किसी को भी यह नहीं देना चाहिये। देवताओं को भी यह दुर्लभ और प्रयत्नसहित गोपनीय है।
जो कोमल मन वाला हो, शांतचित्त हो, गुरुभक्ति परायण हो, कुलीन हो, उसी को यह मुद्राविधि देनी चाहिये, जो भोग मुक्ति की दात्री हैं।
मुद्राओं का यह विवरण सर्वव्याधि विनाशक है और अभ्यासशील की जठराग्नि को बढ़ाने वाला है।
उसकी न मृत्यु और जरादिक होता है। न अग्निजल का भय होता हे, वायु का भय भी उसे कहीं नहीं होता।
कास, श्वास, प्लीहा, कुष्ठ, श्लेष्मा आदि बीस प्रकार के रोग मुद्राओं के साधने से नष्ट होते हैं।
अधिक क्या कहूँ? चे चंडकापालि! तुझे सार बताता हूँ कि (मुद्रा के योगियों को) सिद्धिदायक पृथ्वीतल पर अन्य कुछ नहीं है।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
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