आकाशी धारणां मुद्रां यो वेत्ति सैव योगवित् ।
न मृत्युर्जायते तस्य प्रलये नावसीदति ॥
जो साधक आकाशीमुद्रा की पूरी जानकारी से परिपूर्ण रहता है वही सही रूप में योग को पहचानने वाला है, उसकी काल आने पर भी मृत्यु नही होती और प्रलय होने पर भी वह डगमगाता नहीं है ज्यों का त्यों स्थिर रहता है।
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