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घेरण्ड संहिता • अध्याय 3 • श्लोक 61
मुखं समुद्रितं कृत्वा जिह्वामूलं प्रचालयेत्‌ । शनैरग्रसेदमृतं तन्माण्डूकीं मुद्रिकां विदुः ॥
मांडूकी मुद्रा - मुख को बंद करके जिहामूल का चालन करे, पुन: धीरे-धीरे अमृत का पान करे (सहस्रारचक्र के परमानंद का ध्यान करे) इसे विद्वानों ने मांडूकी मुद्रा कहा है।
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