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घेरण्ड संहिता • अध्याय 3 • श्लोक 12
कण्ठसङ्कोचनं कृत्वा चिबुकं हृदयेन्यसेत्‌ । जालन्धर कृते बन्धे षोडशाधारबन्धनम्‌ । जालन्धरमहामुद्रा मृत्योश्च क्षयकारिणी ॥
अब जालंधर बंध - कण्ठ का संकोचन करके ठोड़ी को हृदय पर रखना चाहिये। इसी जालंधर बंध के करने से सोलह प्रकार का आधार बंध होता है। जालंधर महामुद्रा मृत्यु का भी क्षय करने वाली है।
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