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घेरण्ड संहिता • अध्याय 3 • श्लोक 74
यन्नाभिस्थितमिन्रगोपसदूशं बीजं त्रिकोणान्वितं तत्त्वं तेजमयं प्रदीप्तमरुणं रुद्रेण यत्‌ सिद्धिदम्‌ । प्राणांस्तत्र विनीय पञ्चघटिकांश्चित्तान्वितां धारयेत्‌ ऐषा कालगभीरभीतिहरणी वैश्वानरी धारणा ॥
आग्नेयी मुद्रा - (यह मुद्रा अग्नितत्व में स्थित है) इसका स्थान नाभि और इन्द्रगोप (भगवान की गाय-बरसाती लाल रंग का एक गोल कीड़ा) जैसा इसका तीन कोण वाला वर्ण है, तेजयुक्त दीप्त अरुण जैसी आभा है और रुद्र इसके देवता है। (इस स्वरूप का प्राणों को रोककर कुंभक में पाँच घटी (२घण्टा) तक चित्त में ध्यान करे। इससे संसार का भय दूर होता है, यह वैश्वानरी (आग्नेयी) धारणा है।
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