सत्यं सत्यं पुनः सत्यं सत्यमुक्तं महेश्वर ।
शाम्भवीं यो विजानीयात् स च ब्रह्म न चान्यथा ॥
शांभवी मुद्रा को (तत्वतः) जो जानता है, वह साक्षात् ब्रह्म स्वरूप है। यह पूर्ण सत्य है, अन्यथा की संभावना नही है।
(समीक्षा - भावार्थ यह है कि शांभवी मुद्रा तन, मन, हृदय को परंशान्ति प्रदान करने वाली है। सब संतापों-तनावों को शांत करने वाली है। और जब मनुष्य के सब तनाव-घोर अंशाति शांत हो जायेगी तो ब्रह्मशक्ति (प्रजनन शक्ति) विष्णुशक्ति (परिवार समाज आदि की पालनाशक्ति) आदि विलक्षण और सुदृढ़ शक्तियाँ मनुष्य प्राप्त करता हैं।)
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