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घेरण्ड संहिता • अध्याय 3 • श्लोक 83
कण्ठपृष्ठे क्षिपेत्पादौ पाशवद्‌ दृढबन्धनम्‌ । सा एव पाशिनी मुद्रा शक्ति प्रबोधकारिणी ॥
पाशिनी मुद्रा - कण्ठ और पीठ में दोनों पैरों को डाले और दृढ़ता से इस आसन को बाँधे, यही पाशिनि मुद्रा है, जो कुंडलिनी शक्ति को जगाने वाली है।
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