न च मूर्च्छा क्षुधा तृष्णा नैवालस्यं प्रजायते ।
न च रोगो जरा मृत्युर्देवदेहः स जायते ॥
इस मुद्रा से न तो मूर्च्छा, न क्षुक्षा, न तृष्णा, न आलस्य ही उत्पन्न होता है। और न रोग, न जरा, न मृत्यु ही होती है। अपितु शरीर देवता जैसा हो जाता है।
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