प्रदीप्ते ज्वलिते वह्यो यदि पतति साधक: ।
एतन्मुद्राप्रसादेन स जीवति न मृत्युभाक् ॥
प्रदीप्त और जलती हुई अग्नि में यदि साधक गिर जाये तो इस मुद्रा के प्रसाद से वह जीवन धारण करता है, न कि मृत्यु।
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