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घेरण्ड संहिता • अध्याय 3 • श्लोक 76
यद्धिन्नाउजनपुज्जसन्नि भमिदं धूप्राव भासं परं तत्त्वं सत्त्वमयं यकारसहितं यत्रेश्वरो देवता । प्राणांस्तत्र विनीय पञ्चघटिकांश्चित्तान्वितां धारयेद्‌ऐषा खे गमनं करोति यमिनां स्याद्वायवी धारणा ॥
वायवी धारणा - इसका वर्ण भिन्न अंजन पुंज के समान, धुएँ के समान है, सत्व इसका गुण और यकार बीज है। स्वयं ईश्वर इसके देवता हैं। इसी स्वरूप का प्राणों को रोककर पाँचघटी (२ घण्टा) तक चित्त में ध्यान करे। आकाश में गमन इसी वायवी धारणा से होता है।
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