वायवी धारणा - इसका वर्ण भिन्न अंजन पुंज के समान, धुएँ के समान है, सत्व इसका गुण और यकार बीज है। स्वयं ईश्वर इसके देवता हैं। इसी स्वरूप का प्राणों को रोककर पाँचघटी (२ घण्टा) तक चित्त में ध्यान करे। आकाश में गमन इसी वायवी धारणा से होता है।
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