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घेरण्ड संहिता • अध्याय 3 • श्लोक 95
ऋजवे शान्तचित्ताय गुरुभक्तिपराय च । कुलीनाय प्रदातव्यं भोगमुक्तिप्रदायकम्‌ ॥
जो कोमल मन वाला हो, शांतचित्त हो, गुरुभक्ति परायण हो, कुलीन हो, उसी को यह मुद्राविधि देनी चाहिये, जो भोग मुक्ति की दात्री हैं।
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